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अपने ही जाल में बुरी तरह से फंस गया चीन, अब पैसे पैसे का हो जाएगा मोहताज

चीन ने पूरी दुनिया का बॉस बनने के लिए जो जाल बनाया था अब वो खुद उसी जाल में घिर गया है. पूरब से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक चीन के खिलाफ एक ऐसा चक्रव्यूह तैयार हो गया है जिसमे घिर कर वो पैसे पैसे को मोहताज होने वाला है. रिपोर्ट तो ये भी है कि चीन में सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के खिलाफ असंतोष तेज हो गया है और अपनी जनता का ध्यान भटकाने के लिए राष्ट्रपति जिनपिंग ने राष्ट्रवाद का कार्ड खेल कर ताइवान, हांगकांग और भारत में जानबूझकर तनाव मोल लिया है. आज हम आपको बताएँगे कि कैसे चीन अपने ही चक्रव्यूह में घिर गया है.

बात पहले अमेरिका और चीन के बीच चल रहे ट्रेड वॉर की. कोरोना की वजह से अमेरिका और चीन के बीच तनाव चरम पर पहुँच गया है. लेकिन इन दोनों ही देशों के बीच ट्रेड वॉर कोरोना संकट शुरू होने से पहले से ही जारी है. चीन के निर्यात का कुल 17 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका का है. अमेरिका पहले ही चीन से आयात होने वाले कई चीजों पर कस्टम ड्यूटी बढ़ा चुके हैं. अमेरिकी कंपनियों का चीन से निकल कर वापस अमेरिका आने का बिल सीनेट में पास हो चुका है. इसके अलावा चीन में मौजूद करेब 1000 कंपनियां कोरोना के बाद पैदा हुए हालातों को देखते हुए वहां से निकलने का फैसला ले चुकी हैं/ आईफोन ने तो भारत में अपना मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने का ऐलान भी कर चुकी है.

दरअसल चीन ने लेबर और सस्ते हैं और माहौल पेशेवर है. लेकिन अब भारत ने चीन से निकलने वाली कंपनियों के लिए रेड कारपेट बिछाया और अपने लेबर लॉ में सुधार किया. करीब 300 कंपनियों ने भारत में अपने प्रोडक्शन यूनिट लगाने का मन बना लिया है. बाकि कंपनियों से बातचीत चल रही है. इसके अलावा भारत चीन का एक बड़ा बाज़ार है. चीन के खुल निर्यात में भारत का हिस्सा 3 प्रतिशत है. भारत में बायकॉट चीन मुहीम एक बार फिर तेज हो गई है. केंद्र सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान शुरू किया है जिसका फोकस स्वदेशी वस्तुओं पड़ है. चीन को होने वाले नुकसान का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है.

चीन के रिश्ते न सिर्फ भारत और अमेरिका बल्कि कई अन्य देशों से भी बेहद ख़राब हो चले हैं. ऑस्ट्रेलिया उन्ही में से एक है. चीन स्टील का सबसे बड़ा आयातक देश है और वो अपनी जरूरत की स्टील का बड़ा हिस्सा ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया से मंगाता है. ऑस्ट्रेलिया और चीन के बीच हालात्तो इतने ख़राब हैं कि चीन ने ऑस्ट्रेलिया को अमेरिका का कुत्ता तक कह दिया.

दूसरे देशों में हस्तक्षेप करने के लिए चीन सस्ते कर्ज की नीति पर चलता है. छोटे और गरीब मुल्कों को कर्ज के जाल में फंसा कर वो उनपर कब्ज़ा करना शुरू कर देता है. पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव और कुछ अफ़्रीकी देशों में चीन ने यही चाल चली. श्रीलंका पर चीन का कर्ज इतना ज्यादा हो गया कि उसे अपना हम्बनटोटा पोर्ट चीन को सौंपने की नौबत आ गई थी. लेकिन अब श्रीलंका ने चीन से अपना पीछा छुड़ा लिया है. दुनिया के सभी देश चीन की मकारियों से अच्छी तरह वाकिफ हो चुके हैं. और चीन की अर्थव्यवस्था और रणनीति पर इसका बुरा प्रभाव पड़ना तय है. चीन हर मोर्चे पर घिरा हुआ है. अगर वो नहीं सुधरा तो पैसे पैसे का मोहताज हो जाएगा और USSR की तरह उसका भी हाल हो जाएगा.

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